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ना मैं भगवे को जानता हूँ, ना मैं हरा पहचानता हूँ /

Posted On: 12 Sep, 2017 कविता में

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ना मैं भगवे को जानता हूँ ना मैं हरा पहचानता हूँ /
लहराए शान से तिरंगा मैं अपनी शान समझता हूँ /
आ जाय कभी विपदा अपने इस तिरंगे की आन पे -
कटाने को शीष इसके खातिर, मैं तैयार रहता हूँ /
ना मुझे मस्जिद को तोड़ना है ना मंदिर बनाना है /
मुझे तो अपनी जन्मभूमि का सब कर्ज चुकाना है /
लेकर जन्म पाया है जहाँ का पवित्र अन्न जल वायु /
उसी की खातिर है जीना उसी के लिए मर जाना है /
ना कोई यहाँ हिन्दू ना ही मुश्लिम, सिख ना ईसाई /
जो इस धरती को माँ समझा वो सब अपने ही है भाई /
किसी ने धर्म के खातिर इसे यदि नुकसान पहुंचाया /
उन सबको सबक सीखने को ना बरतेंगे कोई कोताई /
तिलक, टोपी और क्रॉस सबकुछ अपने साथ रखेंगे /
सिखलाये देशप्रेम उन सब धर्मों का सम्मान रखेंगे /
पढ़ेंगे गीता , बाइबिल, कुरआन, गुरुबाणी फिर भी -
सबसे ऊपर अपना प्यारा पवित्र संबिधान रखेंगे /

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ashasahay के द्वारा
September 18, 2017

वाह बहुत सुन्दर कविता।


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