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.....और भगवान अपने सिंघासन पर विराजमान हो गए ( शिक्षाप्रद कहानी -२)

Posted On: 18 May, 2015 Others में

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कमलपुर नाम का एक गाँव था /गाँव के लोग बहुत ईमानदार और मेहनती थे लेकिन इस गाँव में विकासः का कही कोई नामोनिशान नहीं था / गाँव के लोग खेतो में कड़ी मेहनत करते परन्तु कभी बाढ़ तो कभी सुखा उनके मेहनत पर पानी फेर देते / कड़ी मेहनत के वावजूद गाँव के लोग दो वक्त का भोजन अपने परिवार के लिए ठीक से नहीं जुटा पाते थे / उनके बच्चों को दूध-फल तो दूर, भरपेट अनाज भी नहीं मिलता था / प्रायः सभी बच्चे कुपोषण के शिकार थे / एकदिन गाँव के पंचायत में इसका कारण ढूढ़ा गया / और इसके निदान के लिए गाँव में एक भव्य मंदिर के निर्माण का फैसला किया गया / सब गांववाले अपने खर्च में कटौती करके मंदिर निर्माण के लिए धन एकत्रित करने लगे / इसके लिए उपवास भी रहना पड़ता था/ अगल-बगल के गावों में जाकर चंदे इकठ्ठा किया गया / जैसे भी हो कुछ महीनो में मंदिर बन कर तैयार हो गया / शिवरात्रि के शुभ मुहूर्त पर मंदिर का उद्घाटन करवाने का व्यवस्था किया गया / जोर-शोर से तैयारियां शुरू हुई / १०१ लीटर दूध से भगवान को स्नान कराना था / लोगो ने अपने बच्चों और बछड़ों को दूध ना पिलाकर भगवान को स्नान कराने के लिए दूध एकत्रित किया / कुछ दूध बाहर से दान में भी एकत्रित किया गया / भगवान को भोग लगाने के लिए ५६ तरह के व्यंजन तैयार किये गए / तरह-तरह के फलों को प्रसाद के रूप में चढाने के लिए मंगवाया गया / यज्ञ में आहुति देने के लिए १५१ लीटर घी का प्रबंध किया गया था / मंदिर में स्थापित करने के लिए देव-देवियों की मूर्तियों मँगा ली गई थी / काशी से एक विद्वान ब्राह्मण मूर्तियों में प्राण-प्रतिष्ठा के लिए बुलाये गए थे / मूर्तियों के लिए सिंघासन सज-धज कर तैयार था / गाँव वालों ने इस कार्यक्रम को भव्य बनाने के लिए कोई कोर-कसर नहीं छोड़ा था / कई महीनो से बच्चों से लेकर जवान और बूढ़ों सभी ने अपने पेट काट कर इसके लिए धन एकत्रित किया था /
सुबह से ही भीड़ जमा होने लगी थी / कार्यक्रम शुरू होने के पहले ही पूरा गाँव उमड़कर कार्यक्रमस्थल पर आ गया था / भगवांन के जय के नारों से आकास गूंज रहा था / छोटो-छोटे बच्चे वहा रखे गए दूध, पकवान और फलों को देखकर ललच रहे थे / १०१ लीटर दूध एकत्रित करने के चक्कर में उनको कई दिनों से दूध नहीं मिल पाया था / इतने तरह के व्यंजन गांववाले खाना तो दूर आजतक देखे भी नहीं थे / सबके मुंह में व्यंजनों के सुगंध से पानी आ रहा था / कुछ बच्चे इन्हे देखकर पाने के लिए मचलकर रोने लगे थे / लेकिन भगवान के जयकारे में इनकी रुलाई दब जा रही थी / शुभ मुहूर्त पर कार्यक्रम शुरू हुआ हुआ / मूर्तियों को उनके जगह पर ले जाने के लिए उठाया जाने लगा / लेकिन आश्चर्य कोई भी मूर्ति अपने जगह से हिलने का नाम नहीं ले रही थी / पुरोहित से लेकर यजमान और गांववालों के लाख प्रयास के वावजूद मामूली वजन की मुर्तिया टस से मस नहीं हो रही थी / धीरे-धीरे मुहूर्त शेष हो गया लेकिन ना मुर्तिया अपने जगह से हिली ना उन्हें उनके जगह पर स्थापित किया जा सका ना दुग्धाभिषेक हुआ ना प्राणप्रतिष्ठा / ५६ तरह के व्यंजन और फल भोग लगाने के लिए धरे के धरे रह गए / पंडित जी ने कहा जरूर कोई भूल -त्रुटि हुई है इसलिए भगवान नाराज हो गए है और वह उठ कर जाने लगे / चारो ओर निराशा और आशंकाए फ़ैल गई / लोग जड़ होकर खड़े थे / बच्चे अब भी दूध और फलों को देखकर ललच रहे थे / कार्यक्रम स्थगित कर दिया गया / दूध और फलों को बच्चों में बाँट दिया गया / ५६ तरह के व्यंजन गांववालों को खिला दिया गया / आहुति देने के लिए मंगाए गए घी को बीमार और बच्चो में बाँट दिया गया / सभी लोग धीरे-धीरे अपने -अपने घर चले गए / तरह-तरह के व्यंजन खाने के वावजूद निराशा और आशंकाओं से सभी दुखी नजर आ रहे थे / बच्चे बड़े खुश नजर आ रहे थे / रात हुई / सभी लोग बिछावन पर सोने के लिए चले गए / लेकिन आँखों में नींद ना थी / अचानक निर्माणाधीन मंदिर से घंटों और घड़ियाल के आवाज सुनकर सभी चाौक गए / भागे -भागे सभी मंदिर के पास आये / वहाँ का नजारा देखकर सभी दंग रह गए / प्रदीप स्वयं जल रहे थे / घंटे यु बज रहे थे मानो कोई उन्हें जोर-जोर से बजा रहा हो / फूलों और चन्दन के सुगंध से पूरा मंदिर प्रांगढ़ गमक रहा था / भगवान की मुर्तिया स्वयं अपने सिंघासन पर विराजमान हो गई थी / लोग ख़ुशी से जय-जयकार करने लगे / भगवान की मुर्तिया उतनी ही खुश नजर आ रही थी जितने खुश दूध, फल, घी और स्वादिष्ट व्यंजन प्राप्त कर बच्चे और बुजुर्ग /

शिक्षा: जरूरतमंद की सेवा में ही भगवान की सेवा है / जीवों को कष्ट देकर भगवान को खुश नहीं किया जा सकता /

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